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“सावन शिवरात्रि 2026 में 11 अगस्त, मंगलवार को मनाई जाएगी। चतुर्दशी तिथि 11 अगस्त सुबह 4:54 बजे से शुरू होकर 12 अगस्त रात 1:52 बजे तक रहेगी।”

सावन शिवरात्रि कब है? ऐसी मान्यता है कि सावन मास में पड़ने वाली सावन शिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित की गयी है और इस दिन को एक विशेष पर्व के रूप में मनाया जाता है। सावन शिवरात्रि कब है?

शिव भक्त इस दिन अपनी कांवड़ यात्रा पूरी कर मंदिरों में जाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं जिससे उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से वे अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की विवाह, स्वास्थ्य, करियर और परिवार से जुड़ी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। शिवरात्रि पर भक्त शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और गंगाजल अर्पित करते हैं साथ ही “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हैं। तो अब आप लोग जान ही गए सावन शिवरात्रि कब है? आगे जानेगें कि सावन शिव रात्रि क्यों मनाई जाती है व इसका धार्मिक महत्व क्या है ?

सावन शिवरात्रि क्यों मनाई जाती है?

धार्मिक मान्यता है कि सावन मास की शिवरात्रि के दिन देवी पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनसे विवाह करने के लिए सहमत हुए थे तथा इसी दिन शिव अपने ज्योतिर्लिंग में भी अवतरित हुए थे,

इसलिए इस दिन को आदर्श वैवाहिक जीवन और अच्छे वर की कामना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

इस दिन व्रत व पूजा करने से उनकी अपार कृपा प्राप्त करने और सावन मास की आध्यात्मिक ऊर्जा का लाभ उठाने के लिए मनाई जाती है।

इस दिन देश भर के सभी शिव मंदिरों में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने का विशेष महत्व है।

सावन शिवरात्रि हमें त्याग, भक्ति, संयम और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देती है।

भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए विष पिया, जो यह सिखाता है कि दूसरों के कल्याण के लिए त्याग करना सबसे बड़ा धर्म है।

सावन शिवरात्रि भगवान शिव को बहुत प्रिय है और इस दिन किया गया जलाभिषेक व मंत्र जाप लाखों पुण्यों की प्राप्ति करता है।

सावन की महाशिवरात्रि का क्या महत्व है?

शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र अर्पित करते भक्त

एक और मान्यता प्रचलित है कि सावन के महीने में ही समुद्र मंथन में सबसे पहले समुद्र से भयंकर विष निकला जिसे हलाहल विष कहा गया। यह विष इतना खतरनाक था कि पृथ्वी नष्ट हो सकती थी इसलिए जीवों की रक्षा हेतु भगवान शिव ने इस विष को अपने कंठ में धारण किया था, माता पार्वती ने विष को शिव जी के गले में ही रोक दिया जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया।

जिसकी वजह से भगवान शिव को नीलकंठ नाम से भी जाना जाने लगा। तब से सावन मास की महिमा बढ़ गई क्योंकि मासिक शिवरात्रि नियमित साधना और आत्मशुद्धि का अवसर देती है। और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी आराधना की जाने लगी।

सावन शिवरात्रि कब है? प्रत्येक वर्ष लाखों शिवभक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए हरिद्वार से गंगाजल लाकर इस दिन शिवलिंग पर अर्पित करते हैं और इस तरह सावन शिवरात्रि के दिन कांवड़ यात्रा का समापन भी होता है। सावन शिवरात्रि भगवान शिव को बहुत प्रिय है और इस दिन किया गया जलाभिषेक व मंत्र जाप लाखों पुण्यों की प्राप्ति करता है।

शिवरात्रि और महा शिवरात्रि में क्या अंतर है?

शिवरात्रि प्रत्येक मास में आती है और लोग इसे सादगीपूर्ण ढंग से मानते हैं जबकि अगर महाशिवरात्रि की बात की जाये तो यह एक भव्य आध्यात्मिक पर्व के रूप में मनाई जाती है जिसमें दिन में कठोर निर्जल उपवास तथा रात्रि में जागरण, जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, मंदिर दर्शन और विस्तृत तौर पर कई अनुष्ठान होते हैं। सावन की शिव रात्रि से पहले से ही लोग भंडारे का आयोजन करते हैं और शिव रात्रि पर भक्त पूरी रात जागते रहते हैं तथा “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हैं

सावन शिवरात्रि कब है? धार्मिक मान्यता यह भी है कि इस पावन रात्रि में भगवान शिव की आराधना करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। जो शिव भक्त होते हैं वे पूरे सावन मास सात्विक भोजन करते हैं तथा प्याज लहसुन जैसे तामसिक भोजन से दूर रहते हैं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस भोजन के सेवन से उपवास टूट जाता है। इसलिए सावन शिवरात्रि कब है? ये जानकारी काफी दिनों पहले ही ले लेते हैं। और इसलिए वे सावन शुरू होने से पहले ही प्याज-लहसुन खाना छोड़ देते हैं। यहाँ तक कि सावन मास में कढ़ी के सेवन का भी निषेध माना जाता है।

सावन शिवरात्रि में भगवान शिव की पूजा के विशेष नियम कुछ इस प्रकार हैं

सावन की शिव रात्रि के दिन भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं दिन के पहर में फल खाते हैं जैसे केला, सेब, अंगूर और नारियल पानी पीते हैं। कुछ भक्त निर्जला उपवास भी करते हैं। वे दिन भर न ही फल ग्रहण करते हैं और न ही जल। महाशिवरात्रि की पूजा पूरी रात की जाती है जिसमें चारों प्रहर की पूजा की जाती है।

दिन और रात के अलग-अलग पहर होते हैं। जिनका अपना एक धार्मिक महत्व होता है। प्रत्येक प्रहर में शिवलिंग का जल, दूध, दही, शहद और बेलपत्र से अभिषेक किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चारों प्रहरों में नियमपूर्वक पूरे श्रद्धाभाव से भगवान शिव की पूजा करने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों को मनचाहा फल प्रदान करते हैं।

1. सुबह जल्दी स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
2. घर या मंदिर में शिवलिंग का जलाभिषेक करें।
3. भगवान शिव को बेलपत्र, भांग, धतूरा, शहद और दूध अर्पित करें।
4. “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का 11 , 21 या 108 बार जाप करें।
5. कई भक्त फलाहार व्रत रखते हैं, जबकि कुछ निर्जला व्रत भी करते हैं।
6. रात में जागरण कर शिव चालीसा का पाठ या रुद्राभिषेक करना शुभ माना जाता है।
7. व्रत के दौरान सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।

सावन शिवरात्रि का व्रत कैसे करें?

सावन शिवरात्रि का व्रत रखने के लिए सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन में पूर्ण निष्ठा पूर्वक व्रत के लिए संकल्प लें मंदिर जाकर भगवान शिव को जलाभिषेक व रुद्राभिषेक करें। मंदिर जाना मुमकिन न हो तो घर पर ही शिवलिंग स्थापित करें और पञ्चामृत से उसका रुद्राभिषेक करें, फल तथा फूल अर्पित करें।

दिनभर केवल फल और सूखे मेवे ही खाएं। तरल पदार्थ में केवल ताजे फलों का रस जिसमें चीनी या अन्य पदार्थ न मिलाए गए हों, पानी, नारियल पानी पीयें। तथा अनाजयुक्त भोजन का सेवन न करें।

शिवलिंग पर सबसे पहले जल कहां चढ़ाना चाहिए?

शिवलिंग पर जल चढाने को लेकर लोगों में काफी कन्फूजन रहता है कि जल सबसे पहले शिवलिंग के किस भाग पर चढ़ायें मान्यता ही कि शिवलिंग पर सबसे पहले जल जलाधारी के दाईं ओर चढ़ाना चाहिए वह स्थान भगवान गणेश को समर्पित है, फिर बाईं ओर चढ़ाना चाहिए वह स्थान कार्तिकेय को समर्पित है और फिर मध्य भाग (अशोक सुंदरी के स्थान पर) पर चढ़ाना चाहिए। इसके बाद जलाधारी पर (माता पार्वती के हस्तकमलों पर) और अंत में शिवलिंग के शीर्ष (महादेव) पर जल अर्पित करना चाहिए। इस तरह पूरे शिव परिवार को आपकी तरफ से जल अर्पित हो जाता है जिससे महादेव अति प्रसन्न होते हैं।

सावन शिवरात्रि पूजा समय

  1. निशिता काल की पूजा: रात लगभग 12 बजे के आसपास
  2. रात्रि पूजा: जागरण और शिव आराधना
  3. चार प्रहर की पूजा: जल, दूध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित करने का विशेष महत्व

भारत के विभिन्न राज्यों में सावन शिवरात्रि पूर्ण श्रद्धा से मनाई जाएगी।
उत्तर भारत के प्रसिद्ध शिव मंदिर जैसे काशी विश्वनाथ और केदारनाथ मंदिर में सावन माह के दौरान विशेष पूजाओं का आयोजन किया जाता है।सावन माह की शिवरात्रि उत्तरी भारत के राज्यों जैसे उत्तराखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और बिहार में अधिक प्रसिद्ध है। इन राज्यों में पूर्णिमांत चंद्र कैलेंडर का पालन किया जाता है।

भारत के अन्य राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश, गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और तमिलनाडु में। इन राज्यों में अमावसंत चंद्र कैलेंडर का पालन किया जाता है। इन राज्यों में आने वाली शिवरात्रि आषाढ़ की शिवरात्रि होती है।

सावन शिवरात्रि पर इस दिन क्या चढ़ाएं?

भगवान शिव को ये चीजें प्रिय होती हैं :

भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय माना जाता है। मान्यता है कि तीन पत्तियों वाला बेलपत्र ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक होता है।

  • बेलपत्र
  • गंगाजल
  • दूध
  • शहद
  • धतूरा
  • भस्म
  • सफेद फूल

सावन शिवरात्रि पर क्या करने से बचना चाहिए?

  • तामसिक भोजन से बचना चाहिए।
  • क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
  • पूजा के समय काले तिल और तुलसी भगवान शिव को नहीं चढ़ानी चाहिए।

सावन शिवरात्रि का आध्यात्मिक संदेश

सावन शिवरात्रि कब है? सावन शिवरात्रि हमें त्याग, भक्ति, संयम और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देती है। भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए विष पिया, जो यह सिखाता है कि दूसरों के कल्याण के लिए त्याग करना सबसे बड़ा धर्म है।

निष्कर्ष

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन शिवरात्रि का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा, व्रत व श्रद्धापूर्वक आराधना करने से उन्हें दूध, जल तथा बेलपत्र अर्पित करने से महादेव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है।

सावन शिवरात्रि कब है? अविवाहित कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए और विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य की कामना से यह व्रत पूर्ण निष्ठा से रखती हैं। यदि आप भी भगवान शिव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं, तो सावन शिवरात्रि 2026 पर श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत एवं पूजा अवश्य करें। हर हर महादेव!

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